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इबादत के सिजदे में

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समय कहाँ,,,,
        
                                                    
                            
समय कहाँ ठहरा है,
हर शै पर उसका
ही पहरा है।

जीवन प्रवाह से
रिश्ता,
उसका गहरा है।

जीने की आपाधापी में
वो कहाँ ठहरा है।

उसकी विविधता में ,
विधाता भी ठिठका है।

कृष्ण के महा रास
राम के वनवास में,
उसका ही पहरा है।

भीष्म की प्रतिज्ञा
कर्ण के महाप्रयाण में
प्रयास उसका बहुतेरा है।

प्रकृति का वो भले ही चितेरा है,
पर उसने अपना पहिया
सदा ही जीवन पर ऊकेरा है।

पंच तत्व पर भी,
समय का ही रूप घनेरा है।
पर तिस पर भी
बड़ा उसका फेरा है।

इमारत की नींव में,
इबारत के मायनों में,
इबादत के सिजदे में,
वो कभी कहीं
नहीं ठहरा है।
पर समय का
अपना सवेरा है
पर समय का
अपना एक फेरा है।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा

 
एक घंटा पहले
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