आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इबादत के सिजदे में

                
                                                         
                            समय कहाँ,,,,
                                                                 
                            
समय कहाँ ठहरा है,
हर शै पर उसका
ही पहरा है।

जीवन प्रवाह से
रिश्ता,
उसका गहरा है।

जीने की आपाधापी में
वो कहाँ ठहरा है।

उसकी विविधता में ,
विधाता भी ठिठका है।

कृष्ण के महा रास
राम के वनवास में,
उसका ही पहरा है।

भीष्म की प्रतिज्ञा
कर्ण के महाप्रयाण में
प्रयास उसका बहुतेरा है।

प्रकृति का वो भले ही चितेरा है,
पर उसने अपना पहिया
सदा ही जीवन पर ऊकेरा है।

पंच तत्व पर भी,
समय का ही रूप घनेरा है।
पर तिस पर भी
बड़ा उसका फेरा है।

इमारत की नींव में,
इबारत के मायनों में,
इबादत के सिजदे में,
वो कभी कहीं
नहीं ठहरा है।
पर समय का
अपना सवेरा है
पर समय का
अपना एक फेरा है।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
46 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर