पीढ़ियों को जोड़ती डोर,,,
प्रारब्ध अतीत ऑ वर्तमान
के बीच,
पीढिय़ों को जोड़ती
एक डोर।
यूं तो है अदृश्य सी,
रहती है स्मृति और
संस्कारों में,
यही पीढ़ियों को
जोड़ती डोर।
कभी चेहरे मोहरे से
कभी फितरत से
कभी चाल चलन के
अंदाज़ से,
मिलती जुलती या
के सर्वांगसम सी
यही पीढ़ियों को
जोड़ती डोर।
कभी कोई साहित्य
कभी कोई संस्कृति
कभी सृजन कर्मी
जोड़ कर दिखा देता
यही महीन रेशम सी
पीढ़ियों को जोड़ती डोर।
कभी जन्म
कभी पुनर्जन्म
कभी वेद पुराण
से निःसरत संकेत
इंगित मात्र कर देते
यही है,
पीढ़ियों को जोड़ती
डोर।
कभी भाग्य से
कभी पुरुषार्थ से
कभी प्रारब्ध पुण्य से
फलित हो बहुगुणित होती ,
यही ! यही!
पीढ़ियों को जोड़ती डोर।
विज्ञान ऑ तकनीक
के ज़माने में,
अध्यात्म और सत्संग के
बहाने में,
कभी कभी
उसकी रज़ा से
नमूदार होती है
पीढ़ियों को जोड़ती डोर।
यूं तो डोर है,
अदृश्य,अनजानी
अबूझ ,
पर दिल की गिरह
में गर हो उसकी
इबादत या के रहमत
बस दीख जाएगी
पीढ़ियों को जोड़ती डोर।
कभी मन को
बालमन सा कर दो
खिलखिला कर
तुतलाकर
लो उसका नाम !!!
बस इंद्रधनुष सी
दिखेगी
पीढ़ियों को जोड़ती डोर।
बड़े बजुर्गो की सोहबत
और उनकी मुहब्बत
खोल देगी राज़!
बस एक सजदे से
या के एक साष्टांग से
जोड़ देगी उसी डोर से,
तुम्हारी जीवन डोर ।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा