मिट्टी का मटका
मिट्टी का मटका है तू
फिर भी भटका है तू।
पंच तत्त्व की है
मिलाई,
जल जीवन है
इसकी लुनाई।
बाहर भीतर एक सा है,
फिर किस द्वंद्व में
लटका है तू।
मिट्टी से बना मटका
तब किस अहंकार में
मटकता है तू।
पल -प्रति पल
जीवन जल सा
कल- कल,
कल-कल
सा चलायमान
रहता है तू।
रात-दिन,
साँसों की
आवन -जावन से
कभी तितली
कभी भँवरे सा
उड़ता फिरता है तू।
तीन दिन की मात्र
ज़िंदगी जीता है तू।
कभी कली में बंद
कभी कर्म गली में
बंद!
फिर भी पंच विकारों
में गली -गली बिकता
है तू।
रोज़- रोज़ नहीं तो
कभी- कभी ही सही
श्मशान में मटकों के
हश्र पर,
कितना रोता है तू।
मंदिर -मस्जिद,गिरिजा,
गुरुद्वारों में
कितना- कितना सुनता
है तू,
फिर भी बाहर आते ही,
मटके का मटका है तू।
-सूर्यकांत शर्मा