किराए का मकान
किराए का मकान
है तू,
समझ बैठा जिसे
दुकान है तू।
धुंधली सी दुनिया
से आया है तू
समझ ले
कान खोल कर
सुन ले तू।
महज़ इस मकान में
किराए पर आया है
तू।
न रख कोई ख़्वाब
न ख़्वाहिश कोई,
किराए के मकान
में आ बैठा है तू।
पंच तत्त्व और दस
द्वार के मकाँ में
रहता है तू
पंच विकार और
पूर्व कर्म से घिरा
बैठा है तू।
सबकी चाहत औ
ख़्वाबों का झूला
है तू
कहाँ!कहाँ!
कब !किसे!
क्यों! क्योंकर!
किस गुमां में
फूला है तू ।
तू किराए के
आशियां में आया
जीवन के यौवन काल में
आते ही
क्यूं इतना
हैराँ? परेशां सा?
बौराया है तू।
कामना वासना
के पोखर में
नहीं !नहीं! नहीं!
उस कीचड़ में नहाया
शूकर की मानिंद
लोटता है तू।
किराए के मकान
भी
कभी अपने हुए है!?
अ ग़ाफ़िल
इतना भी ना समझ
है तू।
किराए के मकान
में तन्हाई में आया
है तू
उसी दुनिया में
तन्हा ही जायेगा
तू।
दे! दे! दे ना
सारे का सारा
किराया
उस दो जहां
के मालिक का
प्यारा शहज़ादा है
तू।
-सूर्यकांत शर्मा