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कितने-कितने देशों को अपने सबल सुगंधित समता ममता के आँचल

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हिंदी हूँ मै,,,
        
                                                    
                            

हिंद की हिंदी
हूँ मैं,
पर क्या निज़ाम
की बिंदी हूँ, मैं।
जन-जन की चेतना
हूँ,
संज्ञा हूँ!सर्वनाम हूँ?
और तो और
मानवी क्रिया शक्ति
की क्रिया औ
विशेषण हूँ मैं।

भारत की चेतना का
व्याकरण हूँ मैं।
वेद पुराण उपनिषद
को आत्मसात कराती हूँ, मैं।

माँ सी वाणी
विद्या की कलम
हूँ मैं।
साँसों सा संस्कार हूँ
मैं,
विचार का षोडशी
श्रृंगार हूँ मैं।

मेरी कई बहिनें हैं,
कुछ चचेरी
तो कुछ
ममेरी ऑ फुफेरी हैं।

सभी बहनों से
हिलमिल कर
समूचे देश में विचरती
हूँ ,मैं।

मेरे सभी हैं
सभी की हूँ मैं।
दूर -सदूर
प्रदेशों-देशों में,
सिनेमा गीत और
संगीत से पहचानी
जाती हूँ, मैं।
कभी शैलेंद्र के
कभी साहिर के
गीतों में गूँजती
कभी सुब्रमणियम
भारत की कविता
हूँ मैं।
कितने-कितने देशों को अपने सबल सुगंधित समता ममता के आँचल
में समेटती-सहेजती
हूँ मैं।
आज के युवा भारत
की प्राणवायु हूँ मैं!!!
सबके साथ
सबका विश्वास
सब का विकास!!!
हाँ !हाँ! वसुधैव
कुटुम्बकम की
सहचरी हूँ मैं।
हिंदी हूँ मैं !
हिंदी हूँ मैं।
-सूर्यकांत शर्मा
एक महीने पहले
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