इंकलाब किताबों में नहीं लिखा होता है,
वो नारों से नहीं, खून से लिखा होता है।
वो क्लासरूम की दीवारों पर नहीं पलता है,
वो सड़कों पर, गलियों में चलता है।
इंकलाब भाषण से नहीं आता है,
वो भूखे पेट से उठ कर आता है।
जब रोटी छीन ली जाती है थाली से,
तब उठता है एक हाथ हर गली से।
इंकलाब टाई-सूट वाला नहीं होता,
वो फटे कुर्ते वाला होता।
जिसके पैर में छाले पड़े होते हैं,
पर आँखों में उसके उजाले होते हैं।
किताबों ने इंकलाब को बेच दिया है,
सिलेबस में एक चैप्टर कर दिया है।
असली इंकलाब तो अभी बाकी है,
जो सड़कों पर लिखा जाना बाकी है।
वो इंकलाब जो कुर्सी से नहीं डरता,
वो लाठी-गोली से नहीं मरता।
वो हर दिल में आग लगा देगा,
और जुल्म की जड़ें हिला देगा।
आओ वो इंकलाब हम लाएँगे,
जो किताबों में नहीं मिल पाएँगे।
जो जिएगा हर मजदूर-किसान में,
और गूँजेगा पूरे हिंदुस्तान में।
-सुरजीत क्रान्ति