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बिना कहे सब जीत गया

Suresh Mulchandani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपना अंदाज़ ऐसा रखो,
        
                                                    
                            
कि कोई अंदाज़ न लगा सके…
तुम इस रात के साए में क्यों खड़े हो,
किस बात पर इस तरह मुस्कुरा रहे हो,
और इस सन्नाटे के पीछे
किसका नाम दबाए बैठे हो।
कुछ राज़ सिर्फ दीवारों को पता होने दो,
कुछ परछाइयों को अनकहा रहने दो,
हर सच ज़ुबान पर लाना कमज़ोरी है—
कभी इस गूंगे अंधकार को भी
अपनी गवाही रहने दो।
जो तुम्हारी आँखों को पढ़ना चाहे,
उसे वहाँ सिर्फ अपना ही भ्रम मिले,
और जो तुम्हें मिटाना चाहे,
उसे राख की एक निशानी तक न मिले।
मोहब्बत हो तो एक खामोश कसम बनो,
शोर मचाता इकरार नहीं…
दर्द हो तो सीने में दफ़्न रखो,
किसी बाज़ार का तमाशा नहीं।
और यूँ इस दुनिया से गुज़र जाओ कि ты
तुम्हारी खाली कुर्सी को देखकर भी
लोग कांपते हुए सोचते रहें—
“आख़िर वो कौन सा खेल खेल रहा था…
जो बिना कुछ कहे, सब कुछ जीत गया?”
बस अपनी कहानी के अंत में
इतना सन्नाटा छोड़ जाना,
कि पर्दा गिर भी जाए…
मगर दिल की धड़कनें रुकने न पाएँ।
6 घंटे पहले
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