मिट्टी के घर में सपने बड़े,
आँखों में था उजियारा।
फटी हुई जेबों के अंदर भी,
दिल ने हार न मानी दोबारा।
रातों को भूखा सोया था,
दिन में मेहनत करता था।
किस्मत की सूखी राहों पर,
अपने कदम खुद धरता था।
ना कोई सहारा धन का था,
ना ऊँचा कोई नाम।
बस माँ की दुआ साथ थी,
और मेहनत उसका काम।
गाँव की गलियों से चलकर,
शहरों तक पहचान हुई।
छोटे सपनों की चिंगारी,
एक दिन बड़ी उड़ान हुई।
लोग हँसते थे हालातों पर,
वह चुपचाप सँवरता गया।
टूटी उम्मीदों के पत्थर से,
अपना महल निखरता गया।
फिर एक दिन मेहनत रंग लाई,
किस्मत ने दरवाज़ा खोला।
गरीबी की काली रातों से,
अमेरिका तक सपना बोला।
आज भी मिट्टी याद उसे,
जहाँ से सफर शुरू हुआ।
मेहनत जिसने साथ निभाया,
वही उसका गुरूर हुआ।
- सूरज पालोदिया