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शायद पूछ रही है, "तेरे वो सपने कैसे हैं?"

SUPRIYO DAS

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सब कुछ वैसा ही है...
        
                                                    
                            
बिल्कुल तेरे जैसा है।

सूरज ढलने को है, फिर भी समझ नहीं आता कि मौसम कैसा है।
रात कुछ कहानियाँ सुना रही है...
लेकिन पैमाना वैसा का वैसा ही है।

हवा भी धीरे से कुछ कह रही है...
शायद पूछ रही है, "तेरे वो सपने कैसे हैं?"

सब कुछ धुंधला सा है... लेकिन साफ़ दिखाई देते हैं कुछ चेहरे।
मेरी कहानी जैसी भी है, लेकिन ऐसी ही है...
-सुप्रियो दास
एक घंटा पहले
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