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सपनों का भारत

Sunny Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब संस्कृति,मानवता,कर्तव्यो का,
        
                                                    
                            
हर पाठ अधूरा होगा ।
कैसे ' विश्वगुरू ' का सपना ,
भारत का पूरा होगा ॥

हे नीति नियंता ! ,
भारत की अंकित यह कैसी रेखा हैं ।
आज संस्कृति दुबक गयी ,
मानव धर्म सिसकते देखा हैं ॥

हे दीनबंधु ! क्या कोई मलहम होगा,
मलने को जख्मो से होते कष्टो पर ।
यह काला दिवस भी अंकित होगा ,
भारत के ऐतिहासिक स्वर्णिम पृष्ठों पर ॥

विचलित होता हृदय हमारा ,
यह देख दुर्दशा भारत की ।
क्या सपनों का भारत ऐसा होगा ,
उम्मीद नहीं थी ऐसी शोहरत की ॥

सबने तॊ बस इतना सोचा था,
भारत सतयुग के जैसा होगा ।
क्या कभी किसी ने सोचा था ,
सपनों के भारत में ऐसा होगा ॥

............आगे जारी


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6 वर्ष पहले
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