जब संस्कृति,मानवता,कर्तव्यो का,
हर पाठ अधूरा होगा ।
कैसे ' विश्वगुरू ' का सपना ,
भारत का पूरा होगा ॥
हे नीति नियंता ! ,
भारत की अंकित यह कैसी रेखा हैं ।
आज संस्कृति दुबक गयी ,
मानव धर्म सिसकते देखा हैं ॥
हे दीनबंधु ! क्या कोई मलहम होगा,
मलने को जख्मो से होते कष्टो पर ।
यह काला दिवस भी अंकित होगा ,
भारत के ऐतिहासिक स्वर्णिम पृष्ठों पर ॥
विचलित होता हृदय हमारा ,
यह देख दुर्दशा भारत की ।
क्या सपनों का भारत ऐसा होगा ,
उम्मीद नहीं थी ऐसी शोहरत की ॥
सबने तॊ बस इतना सोचा था,
भारत सतयुग के जैसा होगा ।
क्या कभी किसी ने सोचा था ,
सपनों के भारत में ऐसा होगा ॥
............आगे जारी
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।