आँसू हो या दरिया
जमी नज़र नहीं आती
कुछ नज़र नहीं आता
गर तू नज़र नहीं आती
कोई सूरत भला क्या भाए
जो तसवी नज़र नहीं आती
कुछ नज़र नहीं आता
गर तू नज़र नहीं आती
जिंदा होकर भी साहब
सांस नज़र नहीं आती
धुँआ-धुँआ है शहर
आग नज़र नहीं आती
मेरे जनाज़े की रुख़सत में
भीड़ नज़र नहीं आती
कुछ नज़र नहीं आता
गर तू नज़र नहीं आती
मंदिर, मस्जिद, काबो, में
ख़ुदाई नज़र नहीं आती
बे-बुनियादी सारे वैद हकीम
मरज़-ए-ला-दवाई नज़र नहीं आती
ज़ख्म बड़ा नसूर है
तज्वीज़-ए-रिहाई नज़र नहीं आती
ख़ाक हकीकत है सनी
सच्चाई नज़र नहीं आती
कुछ नज़र नहीं आता
गर तू नज़र नहीं आती
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।