उन गाँठों को खोलिए, जो सुकून छीन लेती हैं,
मन की उलझनों में, खुशियाँ कहीं खो देती हैं।
अनकहे से शब्दों की, परतें जमती जाती हैं,
छोटी-छोटी बातें, दिल को भारी कर जाती हैं।
कभी अभिमान की गाँठ, कभी शिकायत की डोरी।
इनसे बंधकर रह जाती, जीवन की हर एक चोरी।
चलो आज ठान लें हम, मन को हल्का करना है।
जो बीत गया उसे छोड़छाड़ कर अब आगे ही बढ़ना है।
माफी की चाबी से, देखो, हर ताला खुलता है।
प्रेम की एक किरण से देखो, अंधेरा भी छंट जाता है।
कुछ बातें कह देना भी, दिल को राहत देता है
कुछ को चुप रहकर छोड़ना, जीवन सिखा देता है।
जब गाँठें खुलने लगतीं, मन फिर से मुस्काता है।
सुकून की ठंडी छाया में, हर दर्द भूल ही जाता है।
आओ मिलकर सीखें हम, ये सरल सी पहचान है।
गाँठें खोलें दिल की, तभी मिलेगा सच्चा सम्मान है।
-सुनीता तिवारी"सरस"