गणपति का नाम जपूँ, मन में जागे आस।
शब्दसिद्धि की साधना से, भावों का हो विकास।
विघ्नहर्ता जब साथ हों, मिट जाए हर पीर।
शब्दों में फिर शक्ति जगे, भाव बनें गंभीर।
गणपति दें बुद्धि हमें, वाणी में हो सार।
शब्दसिद्धि से सज उठे, लेखन का संसार।
अक्षर-अक्षर पुष्प बनें, भाव बनें उपहार।
माँ शारदे की कृपा मिले, मुखरित
हो विचार।
गणपति मेरे लेखनी के, बन जाएँ आधार।
शब्दसिद्धि से जन-मन तक, पहुँचे प्रेम अपार।
मन निर्मल, वाणी मधुर हो, लेखन हो कल्याण।
गणपति और शब्दसिद्धि से, सफल हो हर अरमान।
-सुनीता तिवारी"सरस"