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सुनो उम्र!

Sunita Bhatt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उम्र ने मेरा हाथ पकड़ कर
        
                                                    
                            
मुझे बावन से तिरेपन वर्ष में बिठा दिया है
उम्र मुझसे कह रही है कि
तुमसे ना होगा प्रिय,
तुम्हारे लिए पर्वत बहुत ऊंचे हैं
तुम चढ़ नहीं सकोगी
तुम तो बैठकर बस
रात के आसमान के स्थिर सौंदर्य
को भरपूर निहारो,
मैंने उम्र से कहा
क्यों निहारूं मैं बैठकर
रात के आसमान के स्थिर सौंदर्य को ?

स्थिरता में तो भ्रम होता है

सुनो उम्र!
पहाड़ पर चढना कोई कठिन नहीं है
कठिन तो भीतर की उस
आवाज़ से प्रभावित नहीं होना है
जो मुझसे
कह रही है कि तुमसे नहीं होगा,

मैंने उम्र से कहा,
मैं पहाड़ पर चढ़ूंगी अपनी कौतुहलता
अपने सवालों में घिरकर,

तुम्हारी उलाहना,

मेरी क्षमता की सीमा का निर्धारण नहीं करती
बल्कि मन के ऊंचे -ऊंचे पहाड़ चढ़ने
के लिए
अनौपचारिक आमंत्रण है मेरे लिए

मैं अपने भीतर का परिभ्रमण करके
स्थिरता में सौंदर्य नहीं
गतिमान में अनुभव के लिए
नई दृष्टि विकसित करूंगी

यूं भी तो उम्र गुजरे हुए समय का हिसाब है
यह जानने के लिए कि क्या सीखा और क्या नहीं सीखा
 
3 घंटे पहले
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