उम्र ने मेरा हाथ पकड़ कर
मुझे बावन से तिरेपन वर्ष में बिठा दिया है
उम्र मुझसे कह रही है कि
तुमसे ना होगा प्रिय,
तुम्हारे लिए पर्वत बहुत ऊंचे हैं
तुम चढ़ नहीं सकोगी
तुम तो बैठकर बस
रात के आसमान के स्थिर सौंदर्य
को भरपूर निहारो,
मैंने उम्र से कहा
क्यों निहारूं मैं बैठकर
रात के आसमान के स्थिर सौंदर्य को ?
स्थिरता में तो भ्रम होता है
सुनो उम्र!
पहाड़ पर चढना कोई कठिन नहीं है
कठिन तो भीतर की उस
आवाज़ से प्रभावित नहीं होना है
जो मुझसे
कह रही है कि तुमसे नहीं होगा,
मैंने उम्र से कहा,
मैं पहाड़ पर चढ़ूंगी अपनी कौतुहलता
अपने सवालों में घिरकर,
तुम्हारी उलाहना,
मेरी क्षमता की सीमा का निर्धारण नहीं करती
बल्कि मन के ऊंचे -ऊंचे पहाड़ चढ़ने
के लिए
अनौपचारिक आमंत्रण है मेरे लिए
मैं अपने भीतर का परिभ्रमण करके
स्थिरता में सौंदर्य नहीं
गतिमान में अनुभव के लिए
नई दृष्टि विकसित करूंगी
यूं भी तो उम्र गुजरे हुए समय का हिसाब है
यह जानने के लिए कि क्या सीखा और क्या नहीं सीखा
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