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नारों के पिंजरे

SUNIL NAYI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज जब देखता हूँ—
        
                                                    
                            
चौराहों पर
नारों की भीड़ है।

उन्होंने आसमान को
टुकड़ों में बाँट दिया,
हर टुकड़े पर एक नाम लिख दिया—
“भगवान।”

कभी एक मुट्ठी उठाई
और कह दिया—
“देशप्रेम।”

अंधी दीवारों पर
रंग लगाया
और उसे धर्म बताया—
दरवाज़ों के रंगों को
बताया “डर।”

और हमारे चारों ओर
सलाख़ें उगा दीं,
अजीब बात है—
ये पिंजरे
लोहे के नहीं थे,

नारों के थे…
या यूँ कहो
ये उनकी चीखें थीं
जो हमारी
नसों में काँटों-सी फैली हैं।

भगवान के नाम पर
हमने खिड़कियाँ
बंद कर लीं,
देश के नारों पर
दोस्तों से नज़रें चुरा लीं,
धर्म की दीवारें
इतनी ऊँची कर दीं,
कि हमारी आवाज़
हमारे कानों तक
नहीं पहुँचती।

और अब
जब कोई पूछता है—
“ज़ुबान”

हम अपना रंग बताते हैं
और—
दीवार पर
एक ईंट और जुड़ जाती है।
2 महीने पहले
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