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कविता - कर्जदार

Sunil Alaria

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक वक्त था जब हम लाखों थे कमाते
        
                                                    
                            
पीठ पीछे आज कर्जदार घर को क्यों हैं जाते
इस कदर ना सताओं दोस्तों इंसानियत के नाते
इज्ज़तदार है हम आपकी तरह किसी को नहीं हैं नचाते
माना की वक्त खराब है हमारा, हम नहीं
कोई रूठ जाए तो कोई गम नहीं
आज भी दोस्ती पर जान छिड़कते हैं हम
वक्त आने पर सब चुका देंगें या फिर हम नहीं
वक्त आ गया है हमारा ऊँची उड़ान का
जवाब देंगे आपके हर एक सवाल का
हम जैसे थे कल भी वैसे ही रहेंगे दोस्तों
याद रखों हमारा कहर है ना कमाल का
जमाना बड़ा मतलबी है फिक्र कहां सबको होती है
ऐसा क्या कर दिया हमने फिर क्यों मुसीबत होती है
वक्त हमारा आने दो दोस्तों नजारा हम दिखाएंगे सबको
फूटी है क़िस्मत हमारी साली बार - बार क्यों रोती है
 
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4 वर्ष पहले
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