सिंह की पदचाप गूँजी, द्वार पर माँ आ खड़ी,
मेरे पापों की जहाँ, लगी थी लम्बी लड़ी।
रौद्र रूप था हाथ में, और नयनों में ज्वाला थी,
आज न्याय करने को आतुर, वो मुण्डों की माला थी।
देखा जब मेरी भूलों को, माँ का धीरज डोला,
उठा हाथ भवानी का, और क्रोध भयंकर बोला।
पड़ा जो हाथ गाल पर, सन्न रह गया मेरा तन,
पर उस एक प्रहार ने, निर्मल कर दिया जीवन।
क्षण भर बीता नहीं कि, माँ का गुस्सा पानी हुआ,
देख मेरी आँखों के आँसू, हृदय फिर दीवानी हुआ।
शस्त्र छोड़कर शेर से उतरीं, मुझे गले से लगा लिया,
मेरे मैले मन को अपनी, ममता से नहला दिया।
सहलाया गाल को अपने, उन कोमल कर-कमलों से,
दूर किया सब डर मेरा, और मन के उन भ्रमों से।
आँखें भर कर बोलीं मैया, "सुन री मेरी लाली,
अब फिर मत बिगड़ना बेटी, तू है मेरी बगिया की माली।"
"ये चोट नहीं, ये सीख है मेरी, ताकि तू न फिर भटके,
दुनिया की इस भीड़ में, फिर कभी न तू अटके।"
माँ का वो दुलार मिला, तो सारा जग मिल गया,
मुरझाया था जो फूल मन का, फिर से वो खिल गया।