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बहन की अभिलाषा

Sukhram Aadivanshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पीहर में जब आती बहनें,
        
                                                    
                            
छुपती, छुपती, हंसती, हंसती।

हंसता अम्बर, धरती हंसती।
बहना को देख बहना हंसती।।

दौड़ा दौड़ा आया भोला।
हाथों में दिया उसके झोला।
उस झोले में अभिलाषा थी।
बच्चों की चहकती आशा थी।
भोली की उसमें थी गुड़िया।
चूरन की उसमें थी पुड़िया।

थोड़े अंगूर संतरे थे, थोड़ी सी जलेबी थी रसती।।

पापा से आकर लिपट गई।
मां के आंचल में सिमट गई।
भाई को गले लगा बहना।
भाभी की ओर चली बहना।
दादी का ऐसा प्यार मिला।
खोया जैसा संसार मिला।

पीहर के प्यार दुलार में वो, फिर भूल गई अपनी हस्ती।

पीहर में जब आती बहना।
खुशियों से भर जाती बहना।
पीहर ही उसकी दौलत है,
पीहर ही उसका है गहना।
दुनियां की कोई बहन नहीं।
कर सकती पीड़ा सहन नहीं।
भाई की आंखों में आंसू,
लख सकती कोई बहन नहीं।।

पीहर उसका खुशहाल रहे, यह सारी उमर कहती रहती।
एक महीने पहले
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