गौरी उसका नाम था
चहकना फुदकना उसका काम था
सुबह सवेरे मां की थामें उंगली
आंगन में मेरे आ जाती
गौरैया सी वो छह साल की लड़की
गौरी उसका नाम था
चहकना- फुदकना उसका काम था
घिसी चप्पल,बिखरे बाल
उधड़ी फ्रॉक से पोंछती नाक
एक हाथ में प्लास्टिक की थैली
जिसमें होते टूटे फूटे खिलौने
और एक गुड़िया मैली कुचैली
रोज़ाना बहुत प्रश्न पूछती मुझसे
और घूम घूम कर डांस दिखाती
माँ की उंगली थामे
घर घर वो जाती
गौरी उसका नाम था
चहकना फुदकना उसका काम था
फिर एक दिन, दो दिन, तीन दिन
गौरी नहीं आई
उसकी मां से बात पूछ कहां है गौरी
वो बोली बाहर बैठी हैं
नहीं लांघेंगी कि गौरी कुछ दिनों तक
किसी भी घर की देहरी
मैंने कहा
बाहर धूप है गौरी को अंदर ले आओ
क्या हुआ है कुछ तो बताओ
वो बोली
सब व्रत कर रहे हैं...
छू लेगी ये पूजा की सामग्री
सब अपवित्र हो जाएगा
पूजा पाठ व्रत सब खंडित हो जाएगा
बड़ी सरलता से गौरी की मां
सब कह गई
और मैं...
बस जड़ सी रह गई
मन में हुआ मलाल उठे कई सवाल
नवरात्रि कर कन्या जिमाते हो
उसी कन्या के छूने भर से
अपवित्र हो जाते हो
जय अम्बे गौरी गा कर देवी को मानते हो
और चहकती फुदकती गौरी को देखकर
त्योरियां चढ़ाते हो
वर्ष में दो बार नवरात्र मानते हो
घर आई गौरी को नजरअंदाज कर जाते हो
यह समझ कब आएगी
देवी तो घर के बाहर बैठी है
भीतर तुम्हारी पूजा कैसे सफल हो पाएगी
यह कैसा व्रत धारण किया है
मन में मानवता के प्रति दया न उपजी
और सौ दान धर्म किया है
पूजा व्रत कर्म धर्म दान क्या है
ऐसे तमाम सवाल सुलझ जाएंगे
यह समझ जाएंगे
जब हम दया धर्म का मूल है
पवित्र-अपवित्र भेदभाव फिजूल है
करना है तो मन को पवित्र करो
भूखे को खाना खिलाओ
प्यासे को पानी पिलाओ
भटके को राह दिखाओ
ज़रूरतमंद को दान दो
धोखा न दो किसी को
सब को स्नेह सम्मान दो
खुद अपने भीतर उतर जाओगे
यकीनन ईश्वर को पा जाओगे
सारी पूजा अर्चना उपासना सफल हो जाएगी
कोई गौरी घर की देहरी से
बाहर नहीं की जाएगी...
कोई गौरी घर की देहरी से
बाहर नहीं की जाएगी...