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दास्तान ए हिन्द

SUKHDEV SUKHDEV

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            POK को पाना दूर,शीश के सौदे हो रहे थे
        
                                                    
                            
माटी में बलिदानों के, कटे शीश भी रो रहे थे।

भगत सिंह भी पूछ रहा था, कीमत कितनी जानी फांसी की
रो पड़ी रूह आगे आकर सत्तावन की झांसी की।

महाराणा का शौर्य पूछता, पूछ लिया तलवारों ने
क्या भारत का भला किया कभी जयचंद से गद्दारों ने?

कितने वीरों की राख लगी कलेजे मेरे?
कहा गंगा यमुना सतलुज, रावी सिंधु की धारों ने
शहीदी दफन है अंदर मेरे, देखो कहा दीवारों ने

मैंने कभी न झुकने दिया शीश हिंद का, इतिहास बताया चेतक घोड़े ने
किस कुर्बानी का इंतजार है अब ? शहीद क्या जलियांवाला बाग में थोड़े थे?

मैंने युद्ध लड़े देखे बाहुबल से
मैंने वीरता का इतिहास देखा,बोल उठी चेतक की काठी भी
मैं कब से लहूलुहान पड़ी!उठकर बोली लाला की लाठी भी।

मैंने क्रांति की ज्वाला देखी,सेंट्रल असेंबली भी बोल उठी
शांति की भी कोई हद होती है अब बापू की अहिंसा भी डोली उठी।

ऊपर से संदेशा भारत के गद्दारों का भी आया है
जो जो दुर्जन बचे हुए ,अपने पास बुलाया है।

जय हिन्द,जय भारत।
-सुखदेव
3 वर्ष पहले
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