मां
ममता की अविरल धारा
जो अमृत कलश धरती है।
अपने जिगर के टुकड़ों के लिए
आकाश पाताल एक करती है।
अपने टुकड़ों में रह कर भी
अपने लाल की खुशियों की कामना करती है
मां
ममता की अविरल धारा
जो कल कल कर बहती है...
अपने बच्चों के लिए पल पल खपती है...
जीवन के मुश्किलातों से डट कर
जात पात धर्मांधों से लड़ कर
दुःख दर्द सब अपने सीने में धर कर
जीवन पथ प्रदर्शक बनती है...
माँ
ममता की अविरल धारा
सब को पवित्र करती है...
इस भाग दौड़ की दुनियां में
जहां कोई किसी के लिए नहीं रुकता है
वही मां सबके लिए रुकती है
अपने बच्चों की परवरिश के लिए
ना जाने क्या क्या ना सहती है
फिरभी जीवन के थपेड़ों से
समाज के सपेरों से हम
बच्चों को बचाती है
माँ
ममता की अविरल धारा
ताउम्र बहती है..
जीवन से लड़ती है.. फिरभी
हम बच्चों में खुशियां हीं खुशियां
भरती है....
जीवन प्रशस्त करती है...
जीवन कलश धरती है
मां
ममता की अविरल धारा
युगों युगों से बहती है...
युगों युगों तक चलती है...
युगों युगों से बहती है...
-सुजीत आनंद