स्वाभिमान
कहते हैं लोग,
उम्र से ज्यादा समझदार होती हैं बेटियाँ,
अपने पिता के जीवन में खुशियाँ भरने में
अदाकार होती हैं बेटियाँ।
मुझे भी करनी है कुछ ऐसी अदाकारी,
कि मिटा डालूँ, समाज में फैली
बेटियों के नाम पर कुरीतियाँ सारी।
आज भी हर जगह अंधविश्वास बसता है,
बन विषैला,विष फैला,बेटियों को डसता है।
पर्दे में रखो उनको,कह
अपनी प्रभुता दिखा हमें दबाता है।
मैं जानती हूँ, हम मान हैं,सम्मान हैं,
गर्वित अभिमान हैं।
लोग हम बेटियों को पूजते हैं
फिर भी हम आगे बढ़ने के लिए जूझते हैं।
पर है सही,तो आधुनिकता को गले लगाऊँगी।
पर अर्थ यह नहीं,
कि अपने धर्म,कर्म,संस्कृति को त्यागूँगी।
मैं अपने पिता का गर्व बनना चाहूँगी।
करें वो मुझ पर अभिमान,कुछ ऐसा करना चाहूँगी।
आसमान को छुए, मेरे पिता का मस्तक।
शालिन,संस्कृति ओढ़े, नविनता को दे दस्तक।
खोलूँ मैं छिपे, सारे आयामों को।
सब पाने का है सामर्थ्य बेटियों में, दिखा दूँ जमाने को।
फिर हथेली को बना दीया,उसे मैं जलाऊँगी।
रख पापा के कंधे पर सर,उनके साथ ही मुस्कराऊँगी।
- सुधीर