तन तो बंधुआ आज भी है, और जहन गुलामी में जकड़ा
फिर भी आजादी कहकर, इंसान फिर रहा अकड़ा अकड़ा
हर पल ही बंदिश में है, छूट न पाया कोई पकड़ा
आजादी बस कहने की है, बुद्धि को दिल ने है जकड़ा
आजाद है परिंदा पिंजड़े से बाहर, तन में बस मन है आजाद
आजाद उमंगें हैं मन में, हर एक यौवन है आजाद
मन के अन्दर आजाद है भावना, नींद में सपना है आजाद
आजाद नितांत अकेला है, या फिर अपना है आजाद
आजाद कली आजाद है भँवरा, मनमोहक तितली है आजाद
आजाद है हर दिल की धड़कन, और मन में मितली है आजाद
उड़ता पंक्षी है आजाद पवन में, निर्द्वन्द वाण है आजाद
आजाद है मन की हर चाहत, जब तन से प्राण हुए आजाद
आजाद है खुशबू, और गंध उड़ाती बू आजाद
आजाद है हर एक स्वप्न सुहाना, जब तन से रूह हुई आजाद
- सुधीर बंसल
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