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मैंने तुम्हें भगवान सौंपे.....

Sudher Mohan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज तक दुनिया ने बोला, आज मैं भी बोल दूं
        
                                                    
                            
मेरे मन का राज है जो, आज उसको खोल दूं
मोक्ष का है मार्ग जो, वो मार्ग मुझको पा गया
भक्ति से मिलते देर से, तब वैर मुझको भा गया
दुष्ट पापी नीच जैसे, नाम मुझको मोह गए
धरती पे जन्मे राम, और दर्शन सभी को हो गए
मुझको बुरा कहने लगे, ये सोच पाए ही नहीं
के राम रावण बोलते, अच्छे बुरे को ही सही
इस बात से अच्छी भला, मेरे लिए क्या बात है
मेरा नाम भी है जुड गया, प्रभु नाम के ही साथ है
मुझसे घ्रणा किस लिए, दुनिया के मन को भा रही
वो चीज ना देखे कोइ, मुझको नजर जो आ रही
अच्छे इन्सां भी थे पहले, राम जन्मे क्यों नही
धरती पे जन्मे राम, रावण के लिए ये हे सही
कंश जेसो के ही कारण, क्रष्ण तुमने पाए हैं
दुष्टों के कारण ही सदा धरती पे ईश्ावर आयें हैं
जब मुझसे घ्रणा करते हो, तो क्यों ना मुझे भुलाते हो
क्या जिवित ना हो जाउंं कहीं, इस डर से सदा जलाते हो
मैं ही बुरा रावण था वो, जिसने तुम्हे श्री राम सौंपे
जला रहे जो मुझ रावण् को, राम दर्श भी उसने रोके
मुझको जलाना छोडकर, मुझसे यदि बन जाओगे
विश्वास मानों राम को, धरती पे फिर से पाओगे
सीता-हरि चाहत मेरी, ये मेरा अंदाज था
मेरे कुल को मोक्ष देने वाला, ही मेेेेरा हमराज था
भगवान को ढूंडा नही, मिलने वो खुद ही आ गए
जी भर के दर्शन कर सका, मेरे कर्म मुझको भा गए
मैं भक्त न था स्वार्थी, मुझे अपने कुल का ध्यान था
कुछ भी समझलो तुम इसे, ये ज्ञान या अभिमान था

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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