स्वरचित रचना प्रकाशन हेतु सादर प्रेषित।
कुछ बोलूँ या कुछ गुनगुनाऊँ या भाग्य पे अपने इतराऊँ,
सौभाग्य मिला कुछ कहने का पर जिन शब्दों से वर्णन हो वीरों की गाथा वो शब्द कहाँ से लाऊँ?
क्या व्यक्त करूँ मैं शब्दों में आजादी के बलिदानों को,
वो शब्द सुमन कहाँ से लाऊँ कि नमन करूँ वीर जवानों को।
कैसे मैं व्यक्त करूँ शब्दों में माँ की आँख के आँसू को,
जब छोड़ गया एक मात्र सहारा बेबस बूढ़े बापू को।
सजल नयनों से बाट जोहती बहना भाई के आवन की,
कैसे धागे बिखरे थे टूटी थी राखी सावन की।
न रंग मेहंदी के छुटे थे न उतरी शादी की चूड़िया थी,
मुँह भी न उसने देखा था जिसके घर जनमी गुड़िया थी।
गर ये सच है कि भारत में चरखे से आजादी आई थी,
तो फिर किसके लिए खाँ, बिस्मिल और मौत की शहजादी आई थी।
मेरा रंग दे बसंती चोला माँ ये बोल उन्होंने बोले थे,
चूम मौत के फंदे को जय हिन्द ही कह वे झूले थे।
जिस अखण्ड एक भारत की खातिर लाखों ने जान गँवाई है,
वह भारत बट गया टुकड़ों में बस हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई है।
जहाँ कभी राम रहीम साथ में कूदे खेले हैं,
आज वहीं पर धर्म जाति के भेदभाव के मेले हैं।
पुलवामा हो या पठानकोट ये सब जयचंदों की करनी है,
संभल जाओ और याद रखो इसकी भरपाई सबको करनी है।
बांटेंगे फिर काटेंगे ये दुश्मन की नीति पुरानी है,
भारत को फिर से लूटने की पापी ने मन में ठानी है।
हम में ही आजाद भगत मंगल झाँसी की रानी है,
जागो फिर से एक बनो बस बात यही समझानी है।
हो सुरक्षित भविष्य देश का तन-मन से सब एक बनो,
सबके अंतर्मन में पुण्य बसे सब कर्म से अपने नेक बनें।
द्वेष, ईर्ष्या, भेद-भाव से व्यर्थ न शहीदों का बलिदान करो,
राम, रहीम, ईशु, गौतम के वंशज एक होकर ये आह्वान करो,
एक बनो सब नेक बनो नव युग का निर्माण करो।
- सुधा पाण्डेय