नाम कमाए कोई परिश्रम ,और किसी का रहता है,
दीपक जलता है खुद से घृत ,और किसी का रहता है।
इमारतों पर नाम हो जिसका, भारी उसी का तमगा है,
नींव में जाने कितने लोगों का, खून-पसीना टपका है।
कविता कोई एक ही छपती, कवि कई रचना लिखता है,
गृहिणी निशदिन घर को संभाले, नाम पति का चलता है।
नाम कमाए कोई परिश्रम..
मंच सजाता है कोई पर, माला कोई पहनता है,
कृषक है बोता बीजों को, पर चूल्हा सबका जलता है।
गर्मी, सर्दी, वर्षा सह कर, अन्न वो पैदा करता है,
फसल उगाये कृषक बिचारा, दाम किसी का चलता है।
नाम कमाए कोई परिश्रम..
मत घबरा बंदे ये तो ,जग की रीत पुरानी है,
⁷बिना रुके बस कर्म किए जा, जीत की लिखनी कहानी है।
ईश्वर के खाते में हर, मेहनत का हिसाब रहता है,
उसकी नज़र से बचकर कोई, रिश्वत फ्रॉड न चलता है।
नाम कमाए कोई परिश्रम..