आज इस विद्यालय में में मेरा अंतिम दिवस है,
जाते जाते कुछ बातें कह जाने को मेरा मन विवश है
गैर हो या अपने सबको अपनाया मैंने,
हर एक मन में अपना ठिकाना बनाया मैंने।
किसी सहकर्मी में मुझे मिला भाई का साया ,
किसी में बहन दिखी , किसी को जिगरी दोस्त बनाया।
हर एक को मैने अपने सच्चे दिल से सम्मान दिया,
किसी ने मुझे भी वही लौटाया तो किसी ने अपमान किया।
अपमान के जहर को कई बार मैं हँसकर पी गई,
बच्चों से दूर जाने के ख्याल से मैं सिहर सी गई।
कल मैं नहीं रहूंगी , मेरी जगह कोई और आएगा,
हो सकता है मुझसे बेहतर बनके वो सबका हो जाएगा।
फिर भी यकीन है इस मंदिर में मेरा नाम याद रहेगा ,
कोई अच्छा तो कोई बुरा जाने के बाद कहेगा।
पर जो ज्ञान दिया बच्चों को वो व्यर्थ नहीं होगा,
मेरे जाने के बाद मेरा असली अर्थ वही होगा ।
न बुरा किया किसी का, न किसी का बुरा कभी सोचा है,
बस कोशिश करके सबके आँसू ही पोछा है।
जाते जाते ये दुआ है आप सबको अपना अभीष्ट मिल जाए,
जब कभी जिक्र हो मेरा सबके मुख पर मधुर मुस्कान खिल जाए।
-सुधा पाण्डेय