आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फिर भी यकीन है इस मंदिर में मेरा नाम याद रहेगा

                
                                                         
                            आज इस विद्यालय में में मेरा अंतिम दिवस है,
                                                                 
                            
जाते जाते कुछ बातें कह जाने को मेरा मन विवश है
गैर हो या अपने सबको अपनाया मैंने,
हर एक मन में अपना ठिकाना बनाया मैंने।

किसी सहकर्मी में मुझे मिला भाई का साया ,
किसी में बहन दिखी , किसी को जिगरी दोस्त बनाया।
हर एक को मैने अपने सच्चे दिल से सम्मान दिया,
किसी ने मुझे भी वही लौटाया तो किसी ने अपमान किया।

अपमान के जहर को कई बार मैं हँसकर पी गई,
बच्चों से दूर जाने के ख्याल से मैं सिहर सी गई।
कल मैं नहीं रहूंगी , मेरी जगह कोई और आएगा,
हो सकता है मुझसे बेहतर बनके वो सबका हो जाएगा।

फिर भी यकीन है इस मंदिर में मेरा नाम याद रहेगा ,
कोई अच्छा तो कोई बुरा जाने के बाद कहेगा।
पर जो ज्ञान दिया बच्चों को वो व्यर्थ नहीं होगा,
मेरे जाने के बाद मेरा असली अर्थ वही होगा ।

न बुरा किया किसी का, न किसी का बुरा कभी सोचा है,
बस कोशिश करके सबके आँसू ही पोछा है।
जाते जाते ये दुआ है आप सबको अपना अभीष्ट मिल जाए,
जब कभी जिक्र हो मेरा सबके मुख पर मधुर मुस्कान खिल जाए।
-सुधा पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर