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रुत भीगी लफ्ज महकने लगे

sudesh saini

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                            भीगी -भीगी रुत महकते लफ्ज
        
                                                    
                            

भीगी भीगी रूत आई लफ्ज महकने लगे,
दूर करने धरती की तन्हाई मेघा घुमड़ने लगे।

गगन से बदरा प्रेम-पत्र भेजने लगे,
हवा के झोके मिलन का संदेश देने लगे।

कुमद-कामिनी ने सोलह श्रृंगार किया,
धूलभरी तपन रैन-वासर इंतजार किया।

अब पिया प्रदेश से लौट आओ रे,
झर-झर नेह की बरसात लाओ रे।

हृदय सागर मे यादों की लहरे आने लगी।
साथ बिताए पलों का सैलाब लाने लगी।

विरहन नैनन नीर कोर से बहा दिया।
स्वप्न नै पीत छवि आलिंगन करा दिया।।

भीगी भीगी रूत आई लफ्ज महकने लगे।
दूर करने धरती की तन्हाई मेघा बरसने लगे।।
14 घंटे पहले
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