उसदिन कुछ बाकी थी
ढलने में साँझ
जब देखा था
चमक रही थी धूप सुनहरी
ऊँचे- ऊँचे तरु फुनगी पर
और कहीँ- कहीँ ऊँचे
किसी मकान की छत पर
हाँ ! उड़ते नभ में
पंछियों के पंख पर
चमकीली धूप को
साँझ ढलते- ढलते
अँधेरा होने से पहले
उसदिन ॥
धूप
उसदिन कुछ बाकी थी
ढलने में साँझ
जब देखा था
चमक रही थी धूप सुनहरी
ऊँचे- ऊँचे तरु फुनगी पर
और कहीँ- कहीँ ऊँचे
किसी मकान की छत पर
हाँ ! उड़ते नभ में
पंछियों के पंख पर
चमकीली धूप को
साँझ ढलते- ढलते
अँधेरा होने से पहले
उसदिन ॥
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