अचानक ! कुछ याद हो आया
मन पर
बीते दिनों को
खिल्लहोरने लगा
नये मकान की
नयी दीवार को
निहारने लगा ,
खड़ी दीवार थी यही कहीँ
टीन से छाई ,
मन पर याद है
उसकी परछाई
खूब खेला था जिसकी
छाँव में
और नीम का पेड़ भी खड़ा था
यही कहीँ
कुछ झुकाव लिये
जिसकी टहनियाँ को तोड़
दातून करते हर
सुबह-सुबह ,
जिसकी डाली पर देखा है खूब
लड़ते -झगड़ते
खेलते कौवों- चिड़ियों को
ग्रीष्म की दोपहरी में जिसकी छाँव में
बैठी होती थी
यहीं कहीँ मेरी गाय ,
यादों का अम्बार
पुराना उमड़ने लगा
नये मकान के सानीग्ध होकर
मानो यादों की गठरी खोल
कुछ खिल्लहोर लगा
कुछ खिल्लहोर लगा ॥
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