जाति-धर्म में सब बँट रहे हैं,
ख़ुद को न इंसान बना रहे हैं,
तुम बताओ, मैं कहाँ तराशूँ इंसान...
जाति-धर्म के प्रति ख़ून खौल जाता,
इंसान ही कुचला जाता है,
तुम इसे कहते हो धर्म...
मैं इसे कहता जंजीर हूँ।
मेरी जाति-धर्म से बनती नहीं,
मोहब्बत से अधूरा हूँ...
जाति-धर्म की दुनिया में,
मोहब्बत का पैगाम फैलाता हूँ।
मुझे ईर्ष्या होती है जाति-धर्म के नाम सुन,
इबादत नहीं जाति-धर्म में,
तुम बातें भी करते हो धर्म की,
जिस धर्म से हो पूरी तरह अनजान।
धर्म-जाति बुरा नहीं,
धर्म के उसूल बुरे हैं,
इंसानों को बाँट दिया,
इंसानों के मन में भ्रम भर दिया।
जाति बनी क्यों बड़ी-छोड़ी,
जिससे बड़ी नफ़रत उत्पन्न हुई,
मोहब्बत सब में है,
किन्तु हर इंसान में नहीं...
ईश्वर मूरत सब पूजते हैं,
इंसानियत उसूल भूल जाते हैं,
ईश्वर पूज के फिर भी करते सब आपस में क्लेश।
ईश्वर की मूरत सुंदर-सुंदर बनाते हैं,
ईश्वर के प्रति स्नेह भी जगाते हैं...
इंसान इंसान से करते नफ़रत,
अब तुम ही बताओ, फिर मैं इसे क्या समझूँ...