ये समुद्र है
कोई कहानी लिखता है
कोई मिटाता है
इसकी गहराई में
क्या छुपा हुआ है
लोगों को कहां पता है
ये तूफानों का घर है
न जाने कितनों को निगल जाता है
हर बार नए प्रकोप के साथ
ये आता है, जाता है
लेकिन अपने प्रयास में
आदमी कमी नहीं आने देता
देखता है, समझता है,
बसता है, उजड़ता है
डटता है, रुकता है, निडरता से
पुनः प्रयास में लग जाता है
विस्तीर्ण स्वरूप में
जीवन मंथन पा जाता है
वह सागर से प्रेम दिखाता है
उसके निकट ही
फिर से घर बसाता है
सागर के कोप का
क्षणिक प्रभाव सहकर
अपने काम में लग जाता है
जब- जब सागर
डराता है, धमकाता है
क्रोध के आवेग में
निर्माण को मिटाता है
मिट्टी का पुतला
पुनः निर्माण में लग जाता है
उसके बड़प्पन को
ये दिखाता है
कि मनुष्य अडिग है
वह उससे ज्यादा भावों को
अपने सीने में रखता है
एक साहस के बल पर
ये समझाता है कि
न जाने कितने
डुबोने वाले सागर
आते है, जाते है
लेकिन उसे हरा कहां पाते है
वह बड़ा है
उसके बड़े होने का
लोगों को डुबोने का
ये जो नजरिया है
एक छोटा सा, अदना सा इंसान
उस पर भारी पड़ जाता है
ये समझ की बात है
जो उसके अहम को
चोट पे चोट पहुंचाती है
वह बड़ा है
ये आपकी समझ है
उससे ज्यादा
भाव है, प्रभाव है
समझ को चुनौती है
नाद है , वेग है, उद्घोष है
रोष है, समय की चेतावनी है
शिव के त्रिशूल से
त्रिशूल का शक्ति प्रदर्शन है
शब्दों का शोर है
जग को ललकार है
खड़े होने की पुकार है
आप ये समझ सकते हो
आपकी समझ बड़ी है ,
लेकिन जीवन दर्शन में
ये समय से बड़ी
सागर से गहरी
एक समझ की बड़ी बात है
- शिव