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आहट भर से मन काँप उठे

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डर लगता है आहट होते ही,
        
                                                    
                            
कि क्या-क्या कर जाऊँ,
कहाँ पे जाऊँ, पहले क्या करूँ,
कुछ भी सोच न पाऊँ।

सन-सन करती तेज़ हवा जब,
कानों से टकराती है,
हिल जाते हैं वृहद वृक्ष,
धरती सारी हिल जाती है।

राम सिहर उठते हैं सोचकर,
अब क्या होने वाला है?
सिर्फ़ तूफ़ान ही आया है,
या और कुछ होने वाला है?

कड़क रही होती है बिजली,
काली घटा घिरी होती,
देख आसमाँ काले बादल,
मन में आशंका भरी होती।

ये जल कहाँ समाएगा,
अगर विकट वर्षा होगी?
नदियाँ जब उफनेंगी सारी,
धरती कैसे सुरक्षित होगी?

एक तरफ़ डर वर्षा का,
दूसारी तरफ़ डर बाढ़ का है,
कितनी तेज़ चलेगी धारा,
कितना कुछ ये बहा ले जाएगी?

कितने पशु-पक्षी बह जाएँगे,
कितनी जनता बह जाएगी,
कितने गाँव और शहर डूबेंगे,
कैसी विपदा आ जाएगी?

किसका घर फिर बच पाएगा,
किसका चूल्हा जल पाएगा?
कौन किनारे बैठा रोएगा,
कौन अपनों को बचा पाएगा?

आहट भर से मन काँप उठे,
जब प्रकृति विकराल हो जाए,
मानव कितना भी शक्तिशाली हो,
एक पल में बेबस हो जाए।
— सूबा लाल “अंजाना”
2 घंटे पहले
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