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तेरे इश्क में

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहाँ-कहाँ न ढूँढा तुझको,
        
                                                    
                            
जब तेरा पता लगा,
मन मेरा प्रसन्न हो गया,
जब होना तेरा पता चला।

तुझे मैं पाना चाहूँ,
तुझसे दूर न जा पाऊँ,
दिल करता है तुझे देखूँ,
नज़रें न हटा पाऊँ।
तुझको इतना चाहूँ मैं,
खुद को ही भूल जाऊँ।

सुबह-सुबह उठकर पहले,
मै नाम जपूँ तेरा,
तेरा ही गुणगान करूँ,
लगे तू ही सहारा मेरा।
अपनी जेब टटोलूँ पहले,
फिर और कहीं मैं जाऊँ,
तेरे लिए इतना पागल,
कैसे तुझको पाऊँ?

तेरे लिए गई मेरी नौकरी,
पूरा हुआ बर्बाद,
घरवालों के गहने बेचे,
फिर भी न हुआ फरियाद।
घर के सारे बर्तन बेचे,
फिर भी न आई लाज,
तेरे इश्क में डूब गया मैं,
छोड़ दिया घर-समाज।

तेरे प्यार में कितना पागल,
बता नहीं सकता,
तेरा रूप-रंग देखे बिना,
मैं रह नहीं सकता।
तुझको पाकर होश न रहता,
क्या-क्या मैं कहता,
तेरे नशे में डूबा रहता,
खुद से दूर ही रहता।

तेरे इश्क ने मुझे किया,
बर्बाद मेरी जान,
तेरे मिलने पर कुछ न बचा,
अब तो गया ये मान।
तू एक बोतल नहीं कोई,
तू सागर से भी बढ़कर है,
सब कुछ समा गया तुझमें,
अब खाली मेरा घर है।

तेरा इश्क बड़ा निराला,
पहले अपना बना लिया,
फिर धीरे-धीरे सब कुछ लेकर,
मुझको ही तन्हा कर दिया।
— सूबा लाल “अंजाना”
2 घंटे पहले
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