अबोध मन से सीख रहे हैं,
जीवन-पथ पर बढ़ते हैं,
कुछ आँखों से देख-देखकर,
कुछ जन के आचरण से।
कुछ माता-पिता से सीखा,
कुछ गुरुजनों और मित्रों से,
कुछ रिश्तों की मधुर सीखें,
कुछ अपने अनुभवों से।
कुछ प्रकृति के रंगों से,
कुछ सूरज-चाँद-सितारों से,
कुछ नदियों और झरनों से,
कुछ धरती के पहाड़ों से।
ठोकर भी कुछ सिखलाती है,
हार नई राह दिखलाती है,
गलती से जो सीख ले मानव,
जीवन-राह सँवर जाती है।
ज्ञान का कोई अंत नहीं,
सीखने की कोई उम्र नहीं,
जो हर दिन कुछ सीखता जाए,
उससे बढ़कर समृद्ध नहीं।
-सूबा लाल "अंजना"