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पुरानी यादें

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब-जब मैं गाँव की ओर चला,
        
                                                    
                            
गलियों ने मुझे पुकारा,
जिन कुओं का पानी पिया,
उसी ने जीवन मेरा सँवारा।

जिन राहों पर चला कभी,
उसने सदा मुझे निहारा,
जिस नदी में स्नान किया था,
उसकासुंदर लगे किनारा।

जन-जन का प्यार पुकार रहा,
आवाज़ दे रही हवाएँ,
बाग-बगीचे झूम-झूमकर,
कहते बचपन की कथाएँ।

वे चेहरे याद दिलाते हैं,
जिनसे स्नेह और प्यार मिला,
जिनको दिल से चाहा कभी,
उनसे ही आशीर्वाद मिला।

जिन लोगों के संग खेला था,
लड़ा-झगड़ा और रूठा था कभी,
वे पल फिर से याद आते हैं,
कितने अनमोल वे थे दिन सभी।

सुख-दुख के क्षण, मेल-मिलन,
प्यारे वे पल, वे घर-आँगन,
विद्यालय, शिक्षक, अनुशासन,
सबने आकर मुझे पुकारा।

जिस पगडंडी से रोज चला,
फिर उसी राह से कॉलेज गया,
कंधे पर थैला, आँखों में सपने,
मन मंज़िल की ओर बढ़ा।

घर की दीवारें बोल रही हैं,
मीठा रस पवन में घोल रही हैं,
तृण-तृण, कण-कण में बसा है मन,
हर गली ने मुझे पुकारा।

कुछ चेहरे अब नहीं रहे,
कुछ आँगन सूने हो गए,
कुछ घर टूटे, कुछ जन छूटे,
कुछ अपने ही दूर हो गए।

वह कुआँ अब सूना पड़ा है,
पोखर भी सिकुड़ गया है,
बागों की हरियाली कम है,
वह बचपन जाने किधर गया है।

कहीं नई सड़कें बन गईं,
तो कहीं पुराने घर ढह गए,
जिन राहों पर कदम पड़े थे,
वे भी जाने कहाँ गए।

पर यादों का गाँव वही है,
मन के भीतर आज भी बसा,
समय भले सब कुछ बदल दे,
बचपन का रिश्ता नहीं मिटा।

गाँव नहीं बस मिट्टी-पानी,
गाँव हमारी पहचान है,
जिसने चलना हमें सिखाया,
वही हमारी पहली शान है।

जब-जब जीवन थक जाता है,
मन गाँव की ओर चला आता,
मिट्टी की खुशबू छूते ही,
बचपन फिर से लौट आता।

अंजाना जब गाँव में पहुँचा,
मन ने बस इतना कहा—
दुनिया चाहे दूर ले जाए,
जड़ से कोई दूर न रहा।

यादों के इस मन के कमरे में,
हर चेहरा आज भी जीवित है,
गाँव भले पीछे छूट गया,
पर गाँव मेरे भीतर स्थित है।
-सूबा लाल "अंजाना"
4 घंटे पहले
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