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लहूलुहान पहलगाम से युद्ध की पुकार

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पहलगाम की घाटी रोई, धरती भी चिल्लाई थी,
        
                                                    
                            
खून से रंगी जब धरती, मासूमियत भी तब शरमाई थी।
खामोश वृक्ष थे देवदार के , पक्षी भी थर्राए थे,
आतंकी के उन वारों से, सब रिश्ते बिलगाए थे।

खिलते थे जहाँ फूल कभी, अब बारूदों की गंध उड़ी,
घाटी के आँगन में गूँजी, रुदन भरी एक छंद जुड़ी।
माँओं की सूनी आँखों में, प्रश्नों की थी बाढ़ आई,
कब तक सहेंगे ज़ख़्म हम सभी चुप्पी भी होगी छाई?

रक्षा प्रणाली चुप बैठी थीं, संयम की थी हद टूटी,
युद्धक्षेत्र से दस्तक आई, जब शांति की बातें छूटी।
नदियों ने रुककर देखा, जब आतंकी था हैवान ,
फिर सीमाएँ लांघ गईं, तब युद्ध बना था समाधान।

आतंकवाद से ग्रसित सभी लोगों की आँखें लाल हुई
चीख पुकार की वे आवाजें दुश्मन की जंजाल हुई।
"पहलगाम की चीखें अब, खामोश नहों रह पाएंगी।
सजा मुकर्रर होगी उसकी,बदले से पाक थर्राएगी।

धुआँ उठ गया सरहद पर तब, कुछ चिंगारी यूं बोलीं,
बातें जो थीं बंद रूम में , बारूदों से है से तोलीं।
शांति गीत अब पीछे रह गए, आवाज़ें संगीन हुईं,
राजनीति की चालों से, अब युद्ध भूमि रंगीन हुईं।

बात थी पानी की पहले, फिर आई सीमा की बारी,
नदी बही थी दोनों में, अब बन गई थी लाचारी।
चिंगारी अब आग बन गई,बदले में हो रही बमबारी
कूटनीति की हार हुई, फिर गरज उठी तोपें सारी।

मोर्चे पे जवान डट गए अब, आँखों में थी आग भरी,
भारत माँ के वीर पुत्र सब, तिलक लगा वादा ये करी।
भू का कंपन, अम्बर गर्जन, इतिहास लिखा जाएगा फिर,
शब्दों की जगह बारूदो से, संवाद किया जाएगा फिर।
-सूबा लाल "अंजाना"
एक वर्ष पहले
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