काश! ये मानवता का भी कोई,
बीज इस तरह का होता।
हर मनुष्य को नित-प्रति जिसका,
सेवन करना होता।
इसकी उत्पत्ति भी न इतनी,
कठिन परिश्रम से होती।
हर पल, हर जगह सरलता से,
सबको निःशुल्क ही मिलती।
कद्र, मान-सम्मान की दुनिया,
चारों ओर सजी होती।
भाईचारा, प्रेम-मोहब्बत से,
हर दिल की दूरी मिटती।
कहीं कोई व्यभिचार, ईर्ष्या,
नफ़रत की न दुकान होती।
आपस में मिल-जुलकर सब रहते,
दुश्मनी कहीं न होती।
जाति-धर्म के भेद न होते,
ऊँच-नीच की बात न होती।
दुख में सबके साथ खड़े होते,
खुशियों में सौगातें होतीं।
भूखा कोई भूखा न सोता,
न कोई लाचार होता।
दीन-दुखी के आँसू पोंछे,
हर हाथ मददगार होता।
बूढ़ों को सम्मान सभी देते,
बच्चों को अधिकार मिलता।
नारी को हर कदम बराबर,
जीने का आधार मिलता।
काश! मानवता का बीज सभी के,
मन-मंदिर में बोया जाता।
प्रेम, दया और सत्य-धर्म से,
जीवन-पथ सजाया जाता।
तब धरती स्वर्ग-सी लगती,
हर चेहरा मुस्काता होता।
इंसान अगर इंसान बने तो,
सच में जग सुंदर होता।