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कपड़े से पहचान

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कपड़ा आया, बच्चा लिपटा, तन ढका, पर वह कुछ न बोला।
        
                                                    
                            
क्या बेटा, क्या बेटी थी, बस चेहरे ने ही भेद खोला।
पोशाक बनी फिर शौक सभी का, उसने ही अमीर-गरीब किया, इतना ही नहीं, पहनावे ने धर्मों का भी जामा दिया।

जंगल, गाँव और शहरों के, लिबासों से पहचान हुई,
रंग, बनावट, वेश देखकर, हर मानव की पहचान हुई।
किसी को पंडित, किसी को मुल्ला, किसी को साधु कहा गया,
वेश-भूषा के आधारों पर, मानव वर्गीकृत किया गया।

विद्यार्थी, शिक्षक, धर्मगुरु, दूल्हा, दुल्हन, घर-बाराती,
मुल्ला, पंडित, पादरी, सिस्टर—सबकी अलग-अलग थी थाती। जीवन भर ये भेद रहे, हर ड्रेस ने रूप नया पाया,
पर अंतिम यात्रा के क्षण में, सबको एक समान ही पाया।

तन पर ओढ़े वस्त्र बदलते, मन का रंग है कहाँ बदलता,
मानवता का सच्चा चेहरा, कपड़ों से कब है निकलता।
कफ़न ओढ़कर अंत समय में, हर अभिमान बिखर जाता,
तब समझ आता—इंसान वही है, जो है इंसानियत निभाता।
-सूबा लाल "अंजाना"
2 महीने पहले
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