आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कपड़े से पहचान

                
                                                         
                            कपड़ा आया, बच्चा लिपटा, तन ढका, पर वह कुछ न बोला।
                                                                 
                            
क्या बेटा, क्या बेटी थी, बस चेहरे ने ही भेद खोला।
पोशाक बनी फिर शौक सभी का, उसने ही अमीर-गरीब किया, इतना ही नहीं, पहनावे ने धर्मों का भी जामा दिया।

जंगल, गाँव और शहरों के, लिबासों से पहचान हुई,
रंग, बनावट, वेश देखकर, हर मानव की पहचान हुई।
किसी को पंडित, किसी को मुल्ला, किसी को साधु कहा गया,
वेश-भूषा के आधारों पर, मानव वर्गीकृत किया गया।

विद्यार्थी, शिक्षक, धर्मगुरु, दूल्हा, दुल्हन, घर-बाराती,
मुल्ला, पंडित, पादरी, सिस्टर—सबकी अलग-अलग थी थाती। जीवन भर ये भेद रहे, हर ड्रेस ने रूप नया पाया,
पर अंतिम यात्रा के क्षण में, सबको एक समान ही पाया।

तन पर ओढ़े वस्त्र बदलते, मन का रंग है कहाँ बदलता,
मानवता का सच्चा चेहरा, कपड़ों से कब है निकलता।
कफ़न ओढ़कर अंत समय में, हर अभिमान बिखर जाता,
तब समझ आता—इंसान वही है, जो है इंसानियत निभाता।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर