भीड़ भरी इस दुनिया में,
इंसान तो भरे पड़े है।
पर इन्हीं इंसानों में
इंसानियत खोज रहा हूँ।
तरह तरह के लोग यहां हैं
चेहरों पर मुस्कान बहुत है,
बाहर से कुछ अंदर हैं कैसे
सच्ची पहचान खोज रहा हूँ।
नफ़रत के बाजार सजे हैं,
प्यार कहाँ अब मिलता है?
अपने ही अपनों से डरते,
ऐसा क्यों अब दिखता है?
जिसके आँसू दिख जाएँ तो
आँखों में नमी आ जाए,
भूखे को दो रोटी देकर
जिसका मन भी मुस्काए।
जाति-धर्म से ऊपर उठकर
जो मानव को मानव माने,
दुख में साथ खड़ा हो जाए,
बिन कहे दर्द को पहचाने।
धन-दौलत सब यहीं रहेंगे,
साथ न कोई जाएगा,
नेकी का छोटा-सा दीपक
जीवन भर जलता जाएगा।
नहीं महल, न सिंहासन माँगूँ,
न कोई सम्मान बड़ा,
बस इतना हो—दुख में कोई
कह दे, “मैं हूँ तेरे साथ खड़ा।”
इसीलिए इस भीड़ भरी दुनिया में
दिल से यही पुकार रहा हूँ—
मंदिर-मस्जिद बाद में देखूँ,
पहले इंसानियत खोज रहा हूँ।
— सूबा लाल “अंजाना”