सच की कोई जगह नहीं है,
झूठ का वृहद पसारा है।
सादा जीवन न चाहिए किसी को,
आडंबर ही प्यारा है।
झूठ का सोना, झूठ की चाँदी,
झूठ का ही संसारा है।
नकली कपड़े, नकली मेकअप,
नकली भाईचारा है।
बातों में मिठास बहुत है,
मन में विष की धारा है।
चेहरे पर मुस्कान सजी है,
दिल में दर्द हमारा है।
रिश्तों में अब प्यार कहाँ है,
स्वार्थ का बोलबाला है।
अपना मतलब पूरा करने को
हर कोई मतवाला है।
सच बोलो तो लोग खफा हैं,
झूठ बोलना न्यारा है।
ईमानदारी बोझ बनी है,
बेईमानी का सहारा है।
मंदिर-मस्जिद खूब बनाए,
मन में अंधियारा है।
पत्थर की पूजा करते हैं,
जीता मानव हारा है।
फिर भी मैं उम्मीद लगाए
सच्चे मन को पुकार रहा हूँ।
इस झूठी दुनिया के बीचों-बीच
इंसानियत खोज रहा हूँ।
— सूबा लाल “अंजाना”