गरीबी का जख्म कभी नासूर बन जाता है,
दर्द सहते-सहते इंसान मजबूर बन जाता है।
कोई मसीहा है क्या, जो इसका मरहम बना पाए,
या गरीब का दर्द भी बस आँकड़ों में खो जाए।
जिस घर में चूल्हा जलता हो उधार की लकड़ी से,
जिंदगी उलझ के रह गई हो जाल जैसे मकड़ी के।
बाप अपनी मजबूरी को सीने में दफन रखता है,
बच्चों की खातिर खुद भूखा रहकर भी हँसता है।
बच्चा जब माँ से पूछे—“आज खाना क्या मिलेगा?”
माँ मुस्काकर कहती है—“बस थोड़ी देर में मिलेगा।”
वह “थोड़ी देर” अक्सर पूरी रात हो जाती है,
माँ की आँखों से सीने तक, बरसात हो जाती है।
किसी के घर में बचा खाना कूड़े में चला जाता है,
वहीं गरीब का बच्चा सिर्फ पानी पीकर सो जाता है।
जहाँ गरीब के तन पर कपड़े मौसम से लड़ते हैं,
किसी के अलमारी में कपड़े पुराने होकर सड़ते हैं।
गरीबी केवल खाली जेब का नाम नहीं होता,
लोगों द्वारा सताए हुए आत्मसम्मान का घाव होता।
भूंख की चिंता जब हर साँस में समा जाती है,
तो इंसान की हँसी भी मजबूरी बन जाती है।
गरीबी का जख्म केवल गरीब का जख्म नहीं है,
यह पूरे समाज के माथे का कलंक है कहीं।
जिस दिन किसी भूखे के घर चूल्हा हँसकर जलेगा,
उस दिन समझना—देश सच में आगे बढ़ेगा।
मसीहा बाहर मत खोजो, अपने भीतर इंसान जगाओ,
जहाँ कोई भूखा मिले—वहाँ इंसानियत का दीप जलाओ।
गरीबी का नासूर मरहम से ही नहीं भर पाएगा,
जब तक न्याय और बराबरी का रास्ता नहीं आएगा।
सूबा लाल "अंजाना,"