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बेचारगी का समय

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नज़रें जिधर जा रही हैं, उधर ही,
        
                                                    
                            
बेचारगी का समय दिख रहा है।
चारों तरफ बेरहमी, बेदिली है,
अंजाना अपनी जुबाँ लिख रहा है।

बेखौफ़ जुर्मों का आलम है पसरा,
डर का ये मंजर बिखरा पड़ा है।
सुरक्षित न जनता कभी भी, कहीं भी,
बेलगाम घोड़ा-सा दौड़ा जा रहा है।

गरीबों के हिस्से में आँसू ही आँसू,
अमीरों का संसार बढ़ता रहा है।
कहीं भूख से बिलखता है बचपन,
कहीं धन का अंबार बढ़ता रहा है।

रिश्तों में अब स्वार्थ घुलता जा रहा है,
अपनापन भी जैसे कहीं खो गया है।
जिसे देखकर आँख नम होनी चाहिए,
वही देखकर आदमी सो गया है।

कहाँ खो गई है दया और ममता,
कहाँ प्रेम का दीप जलता रहा है?
मनुष्य तो बहुत हो गए हैं जहाँ में,
मगर आदमी कम होता जा रहा है।

अभी वक्त है, जाग जाएँ सभी हम,
अँधेरा स्वयं ही मिटाया जा सकता है।
अगर दिल में मानवता जगा लें,
तो संसार फिर से सजाया जा सकता है।
— सूबा लाल “अंजाना”
5 घंटे पहले
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