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अंतर्मन कैसे झांकें

Sooba Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमें कोई भी परख नहीं है,
        
                                                    
                            
अंतर्मन कैसे झांकें,
अपना मन तो समझ न पाए,
दूसरे के मन को क्या भांपें।

अपनी ही गुत्थी सुलझाने में,
सोच सोच थक जाते हैं,
कभी उँगलियाँ दाँतो नीचे,
कभी हाथ माथ रख जाते हैं।

शांत सरोवर मध्य डूब,
चुप चाप अडिग रह जाते है,
मत्था पच्छी करते करते,
यूं समय बीत जाते हैं।

मौन धरा पर बैठ अकेले,
मन की गांठें खोलो तुम।
अपने सुख-दुख, अपने भावों को,
सच्चे मन से तौलो तुम।

जब अपने मन को जानोगे,
जीवन का अर्थ समझ आएगा।
जो खुद से परिचित होगा,
बह जग को भी समझ पाएगा।

इसलिए ,
अब कुछ देर ठहरकर,
अपने भीतर झाँको तुम,
दुनिया को समझने से पहले,
खुद को भी थोड़ा जानो तुम।
-सूबा लाल "अंजना"
एक दिन पहले
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