आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अंतर्मन कैसे झांकें

                
                                                         
                            हमें कोई भी परख नहीं है,
                                                                 
                            
अंतर्मन कैसे झांकें,
अपना मन तो समझ न पाए,
दूसरे के मन को क्या भांपें।

अपनी ही गुत्थी सुलझाने में,
सोच सोच थक जाते हैं,
कभी उँगलियाँ दाँतो नीचे,
कभी हाथ माथ रख जाते हैं।

शांत सरोवर मध्य डूब,
चुप चाप अडिग रह जाते है,
मत्था पच्छी करते करते,
यूं समय बीत जाते हैं।

मौन धरा पर बैठ अकेले,
मन की गांठें खोलो तुम।
अपने सुख-दुख, अपने भावों को,
सच्चे मन से तौलो तुम।

जब अपने मन को जानोगे,
जीवन का अर्थ समझ आएगा।
जो खुद से परिचित होगा,
बह जग को भी समझ पाएगा।

इसलिए ,
अब कुछ देर ठहरकर,
अपने भीतर झाँको तुम,
दुनिया को समझने से पहले,
खुद को भी थोड़ा जानो तुम।
-सूबा लाल "अंजना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर