ऐ ज़िंदगी! तुझे पढ़ न सका
अब तक कोई,
हर पल तू एक नई दास्ताँ
लिखती है।
कभी हँसी के फूल खिलाती,
कभी आँखों को नम करती है,
कभी मिलाती अपने लोगों से,
कभी अपनों से दूर करती है।
जब दर्द के पन्ने भरने लगती,
तो जाने कहाँ से लाती है—
बेहिसाब कितने पन्ने,
एक के बाद एक भरती जाती है।
खुशियों का इज़हार करूँ भी तो कैसे,
कब लिखेगी, किस पन्ने में—
कुछ पता नहीं चल पाता है;
खुशी का पल आते-आते
न जाने क्यों गुजर जाता है।
तेरे किस पन्ने में लिखा है
तरीके से तुझे जीने का?
ग़म छोड़कर मुस्काने का,
दुःख में भी सुख पाने का?
कहाँ लिखा है वह मंत्र
जो मन को हल्का कर दे,
बीते कल का बोझ उतारकर
आज को सुंदर कर दे?
किस पन्ने में लिखा है
हर हाल में मुस्काने का,
जो अपना नहीं रहा उसे छोड़कर
जो अपना है उसे अपनाने का?
किस पन्ने में लिखा है
कि समय कभी ठहरता नहीं,
सुख हो चाहे दुःख का मौसम,
कोई पल फिर लौटता नहीं।
किताब तेरी बड़ी अजीब है,
हर अध्याय अनजाना है,
जिस पन्ने को आज पढ़ रहे हैं,
कल वही पुराना है।
बचपन के पन्ने जल्दी पलटे,
यौवन सपनों में बीत गया,
संघर्षों की लंबी राहों में
कितना जीवन बीत गया।
कभी पिता के त्याग पढ़े हैं,
कभी माँ का ममत्व मिला,
कभी अपनों का साथ मिला तो
कभी अकेले चलना पड़ा।
कभी रोटी कम थी घर में,
फिर भी सपने कम न हुए,
कभी राह कठिन थी इतनी
फिर भी कदम कम न हुए।
कुछ पन्नों पर पसीना है,
कुछ पर आँसू की धार,
कुछ पर अपनों की मुस्कानें,
कुछ पर जीवन का प्यार।
अब समझ आया, ऐ ज़िंदगी,
तू केवल सुख का नाम नहीं;
दर्द मिले तो सहना भी जीवन,
हँस पाना भी कम काम नहीं।
शायद जीने का यही तरीका है—
जो मिला उसे स्वीकार करें,
ग़म को अनुभव बनने दें
और खुशियों को प्यार करें।
जो पन्ना लिख दिया तूने,
उसे मिटाया जा नहीं सकता;
पर अगला पन्ना कैसा होगा,
यह आज से लिखा जा सकता।
इसलिए अब तुझसे शिकायत कम,
समझने की कोशिश करता हूँ;
जो शेष बचे हैं पन्ने मेरे,
उन्हें प्रेम से भरता हूँ।
न जाने अंतिम पन्ना
कब मेरे सामने आएगा,
पर जब आए, तो मन कह पाए—
मैंने तुझे समझने की कोशिश की,
और जितना मिला, उतना जी भरकर जिया।
ऐ ज़िंदगी!
तू चाहे जितने पन्ने लिख,
अब डरना छोड़ दिया है मैंने;
तेरे हर सुख-दुःख को
अपना मान लिया है मैंने।
क्योंकि अब जान गया हूँ—
तू किताब नहीं,
एक अनमोल अवसर है;
हर साँस एक नया पन्ना है,
और हर दिन
उसे सुंदर लिखने का अवसर है।
-सूबा लाल "अंजना"